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12 फरवरी को विरोध क्यों?


आश्रय अभियान पटना में अपने मुख्य समुदायों — अनसंगठित निर्माण मजदूरों और दिहाड़ी मजदूरों — के मानव अधिकारों, सम्मान और कानूनी सुरक्षा के लिए हमेशा से मजबूती से खड़ा रहा है।


12 फरवरी गुरुवार को दोपहर 3 बजे गांधी मैदान के करगिल चौक पर आश्रय अभियान और समान विचार वाले दोस्तों के साथ मजदूरों के अधिकारों और सुरक्षा के समर्थन में एक शांतिपूर्ण कार्यक्रम में शामिल हों।




हाँ, कल 12 फरवरी 2026 को पूरे देश में एक बड़ा हड़ताल (जिसे अक्सर भारत बंद कहते हैं) होने वाला है। इसे AITUC, CITU, INTUC, HMS जैसी बड़ी ट्रेड यूनियनों ने बुलाया है। वे लाखों-करोड़ों मजदूरों के शामिल होने की उम्मीद रखते हैं। मुख्य मांग इन चार नए लेबर कोड को पूरी तरह रद्द करना है।


यह विडियो आपको पूरा मामला बताएगा

ये लेबर कोड क्या हैं?

सरकार ने 29 पुराने मजदूर कानूनों को मिलाकर चार नए कोड बना दिए हैं (2019-2020 में पास हुए और कई राज्यों में हाल में लागू हुए):

  • वेज कोड (मजदूरी कोड)

  • इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड (औद्योगिक संबंध कोड)

  • सोशल सिक्योरिटी कोड (सामाजिक सुरक्षा कोड)

  • ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड (काम की सुरक्षा, स्वास्थ्य और स्थितियों का कोड)

सरकार कहती है कि ये बदलाव नियमों को आसान बनाते हैं, व्यापार करना आसान करते हैं और ज्यादा मजदूरों (जैसे गिग वर्कर और अनौपचारिक मजदूर) को कुछ सुरक्षा देते हैं।


मजदूर और यूनियन क्यों विरोध कर रहे हैं?

यूनियनों का मानना है कि नए कानून कंपनियों के बहुत पक्ष में हैं और मजदूरों के पुराने अधिकार छीन रहे हैं। ये मुख्य कारण हैं जिनसे वे नाराज हैं:


  1. मजदूरों को आसानी से निकालना (नौकरी में कम सुरक्षा) पहले 100 से ज्यादा मजदूरों वाली कंपनियों को छंटनी या निकालने के लिए सरकार की अनुमति लेनी पड़ती थी। अब यह सीमा बढ़ाकर 300 कर दी गई है। मतलब, मध्यम और बड़ी कंपनियां बिना पूछे मजदूरों को आसानी से निकाल सकती हैं। यूनियन इसे “हायर एंड फायर” नीति कहती हैं।

  2. अधिक अस्थायी/ठेका वाली नौकरियां नए कोड “फिक्स्ड-टर्म एम्प्लॉयमेंट” को बढ़ावा देते हैं। कंपनियां मजदूरों को छोटे समय (6 महीने, 1 साल आदि) के लिए रख सकती हैं और समय पूरा होने पर छोड़ सकती हैं। मजदूर डरते हैं कि ज्यादातर नौकरियां स्थायी की जगह अस्थायी हो जाएंगी। नौकरी की सुरक्षा नहीं, लाभ नहीं और हमेशा बेरोजगार होने का डर रहेगा।

  3. यूनियन बनाना और हड़ताल करना ज्यादा मुश्किल नए नियम यूनियन रजिस्टर करना और मान्यता दिलाना कठिन बनाते हैं। हड़ताल के लिए सख्त शर्तें और लंबा नोटिस देना पड़ता है। कुछ हड़तालों को आसानी से गैरकानूनी घोषित किया जा सकता है। यूनियन कहती हैं कि इससे बेहतर मजदूरी और काम की स्थितियों के लिए लड़ने की ताकत कमजोर हो जाती है।

  4. काम के घंटे बढ़ाना कुछ क्षेत्रों में रोजाना काम के घंटे 12 तक किए जा सकते हैं (ओवरटाइम पैसे के साथ)। मजदूर चिंता करते हैं कि इससे थकान ज्यादा होगी और शोषण बढ़ेगा।

  5. सुरक्षा और जांच के नियम कमजोर फैक्ट्री की जांच कम हो जाएगी (मालिक खुद सर्टिफिकेट देंगे)। प्रवासी और ठेका मजदूरों के लिए सुरक्षा समितियां और नियम कई जगह कमजोर कर दिए गए हैं। यूनियन कहती हैं कि इससे मजदूरों की जान और सेहत पर ज्यादा खतरा होगा।

  6. कुल मिलाकर भावना मजदूर और यूनियन महसूस करते हैं कि सरकार बड़े कंपनियों को मदद करने और निवेश लाने (“ईज ऑफ डूइंग बिजनेस”) के लिए कानून बना रही है, लेकिन आम मजदूरों की कीमत पर। वे कहते हैं कि दशकों से बने महत्वपूर्ण सुरक्षा नियम कमजोर या हटा दिए गए हैं।


संक्षेप में:

मजदूर विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ये कानून नौकरियां ज्यादा असुरक्षित बना देंगे, उनकी बातचीत की ताकत घटा देंगे और मालिकों को ज्यादा शोषण करने की छूट दे देंगे।

सरकार और कुछ अर्थशास्त्री कहते हैं कि ये बदलाव देश की अर्थव्यवस्था बढ़ाने के लिए जरूरी हैं और अंत में ज्यादा नौकरियां बनाकर मजदूरों को फायदा पहुंचाएंगे। लेकिन यूनियन इससे पूरी तरह असहमत हैं और पुरानी सुरक्षा वापस चाहती हैं।

कल का हड़ताल चार लेबर कोड को रद्द करने की लंबे समय से चली आ रही मांग का हिस्सा है। यह किसानों की मांगों और निजीकरण के विरोध से भी जुड़ा हुआ है।

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