1942 की विरासत से आज की हुंकार: सात शहीद स्मारक से उठा बदलाव का संदेश
9 अगस्त: भारतीय इतिहास की एक ऐसी तारीख, जो स्वतंत्रता संग्राम और 'भारत छोड़ो आंदोलन' की शुरुआत की याद दिलाती है।
'आश्रय अभियान' की पूरी टीम पटना स्थित 'सात शहीद स्मारक' पर अपनी पूरी ताकत के साथ मौजूद थी। उनके साथ उन बस्तियों और समुदायों के प्रतिनिधि भी शामिल थे, जिनके लिए संस्था काम करती है।
टीम के एक सदस्य ने इस आयोजन की रिपोर्ट कुछ इस तरह तैयार की:
विभिन्न झुग्गी-बस्तियों से आई महिलाओं, पुरुषों और युवा साथियों ने "सात अमर शहीद अमर रहें!" के नारे लगाए।
सिस्टर डोरोथी और टीम के साथ कई जानी-मानी हस्तियां भी इस कार्यक्रम में शामिल हुईं। धर्मेंद्र कुमार जी ने गीतों के माध्यम से शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
इस मौके पर उपस्थित समाजसेवियों—राजेश पासवान, कृष्ण कुमार अंबेडकर, उमा दफ़्दार, बिहार के चर्चित रंग-निर्देशक कुमार मानव, राकेश कुमार (सचिव, बिहार विकलांग संघ) और अजय कुमार—ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा:
"8 अगस्त 1942 को जैसे ही महात्मा गांधी ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' के नारे के साथ बिगुल फूंका, वैसे ही 11 अगस्त को बिहार के छात्रों ने अपनी छाती पर गोलियां खाकर भी विधानसभा पर झंडा फहरा दिया—यानी सीधे ब्रिटिश हुकूमत के सीने पर चोट की। इसके साथ ही पूरे बिहार में क्रांति की आग तेजी से फैल गई।"

क्रांतिकारी नारों के साथ उन वीर शहीदों को नमन और श्रद्धांजलि समर्पित की गई।
'आश्रय अभियान' की निदेशक सिस्टर डोरोथी ने इस बात पर जोर दिया कि एक आजाद, लोकतांत्रिक, बहुसांस्कृतिक और धर्मनिरपेक्ष भारत के निर्माण में छात्र हमेशा से एक महत्वपूर्ण कड़ी रहे हैं, और आज भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए उनकी भूमिका उतनी ही अहम है।
उन्होंने हाल के छात्र आंदोलनों का जिक्र किया, जिनका मकसद एक कमजोर और जर्जर हो चुकी शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाना था। उस दौरान छात्रों ने सत्ता की ताकत और पुलिस की बर्बरता का डटकर सामना किया था।
उन्होंने कहा कि यह आजादी बहुत कठिन संघर्षों के बाद हासिल हुई है। इसलिए देश से प्यार करने वाले हर नागरिक को सजग और सतर्क रहने की जरूरत है, ताकि हमारे संविधान और भारत की बहुसांस्कृतिक व जीवंत पहचान पर होने वाले किसी भी हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके।




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